
ऋषिकेश
उत्तराखंड के ‘सात मोड’ क्षेत्र में 3,200 पेड़ों की बेरहमी से की जा रही कटाई के खिलाफ जन-आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। ‘द हिमाद्री फाउंडेशन’ के नेतृत्व में चल रहा शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आज तीसरे दिन भी पूरे जोश के साथ जारी रहा। शासन-प्रशासन की बेरुखी से नाराज पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने इस विनाश का जवाब बेहद अनोखे और सकारात्मक तरीके से दिया। प्रदर्शनकारियों ने जिस जगह पेड़ काटे जा रहे हैं, ठीक उसके सामने सड़क के दूसरी ओर 80 नए पौधे रोपकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।
प्रशासन की बेरुखी, पर हौसले बुलंद
आरोप है कि पिछले तीन दिनों से लगातार चल रहे इस शांतिपूर्ण आंदोलन के बावजूद शासन-प्रशासन का कोई भी अधिकारी अब तक प्रदर्शनकारियों की सुध लेने या उनके सवालों का जवाब देने मौके पर नहीं पहुंचा है। अधिकारियों के इस उदासीन रवैये के बाद भी आंदोलनकारियों का हौसला डगमगाया नहीं है।
”हम अपने पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा चाहते हैं। हम विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि हम विकास के नाम पर हो रहे इस विनाश के विरोधी हैं।”
— द हिमाद्री फाउंडेशन
’चिपको आंदोलन 2.0′ का शंखनाद
इस आंदोलन ने उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास की यादें ताजा कर दी हैं। आंदोलनकारियों ने देवभूमि के महान पर्यावरण नायकों—स्व. सुंदरलाल बहुगुणा जी और गौरा देवी जी को नमन करते हुए ‘चिपको आंदोलन 2.0’ को जारी रखने का दृढ़ संकल्प लिया है।

तीसरे दिन के आंदोलन की मुख्य झलकियाँ:
- हरित विरोध: 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने एकजुट होकर ठीक कटाई वाले स्थल के सामने 80 पौधे लगाए और संदेश दिया कि हर कुल्हाड़ी का जवाब नए जीवन से दिया जाएगा।
- देशभर से मिल रहा समर्थन: भले ही इस जमीनी लड़ाई का नेतृत्व स्थानीय स्तर पर ‘द हिमाद्री फाउंडेशन’ कर रहा है, लेकिन सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से इस मुहिम को पूरे भारत से लोगों का भरपूर समर्थन और प्रेरणा मिल रही है।
- युवाओं की भारी भागीदारी: आज के प्रदर्शन में प्रतीक वर्मा, अरुणिमा, शगुन उनियाल, आशुतोष कोठारी सहित सैकड़ों युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद की।

आर-पार की लड़ाई: आगे की रणनीति
द हिमाद्री फाउंडेशन और क्षेत्र के नागरिकों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी आकर इस पर्यावरण विनाश को रोकने और अपनी जवाबदेही तय करने का लिखित आश्वासन नहीं देता, तब तक यह आंदोलन थमेगा नहीं, बल्कि इसे और उग्र किया जाएगा। फाउंडेशन ने देश के युवाओं और मीडिया से इस मुहिम का हिस्सा बनने और उत्तराखंड के जंगलों को बचाने की भावुक अपील की है।
