
देहरादून:
उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था से एक ऐसी हैरान करने वाली कहानी सामने आई है, जो यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब नीयत में खोट हो, तो सरकारी फाइलों को ‘पंख’ कैसे लग जाते हैं। हरिद्वार जमीन घोटाले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा आईएएस वरुण चौधरी को बर्खास्त करने और अन्य अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की संस्तुति के बाद एक बड़ा खुलासा हुआ है। आमतौर पर जिस भू-उपयोग परिवर्तन (धारा 143) की प्रक्रिया को पूरा करने में आम नागरिकों को महीनों दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और सालों लग जाते हैं, वही कृषि भूमि इस घोटाले में महज 7 दिनों के भीतर आवासीय श्रेणी में बदल दी गई।
क्या है पूरा ‘खेल’ और ₹39 करोड़ का नुकसान?
हरिद्वार नगर निगम के कूड़ा निस्तारण (ट्रेंचिंग ग्राउंड) के लिए जमीन खरीदी जानी थी। नियम-कायदों को ताक पर रखकर अफसरों और भू-माफियाओं के गठजोड़ ने एक ऐसा ताना-बाना बुना जिसके तहत 15 करोड़ की जमीन 54 करोड़ में खरीदी। जो 2.3070 हेक्टेयर जमीन महज 15 करोड़ रुपये की थी। उसे मानकों का उल्लंघन करके 54 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि में खरीदा गया। यानी सीधे तौर पर जनता की गाढ़ी कमाई के 39 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया। इस पूरे मामले में कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर शिकंजा कसा जा रहा है। मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत इस बार केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज नहीं गिरी है, बल्कि सीधे शीर्ष अधिकारियों को निशाने पर लिया गया है।
